चलिए फिल्म के एक सीन को इमेजिन कीजिये… सीन नंबर १
रात में एक आदमी अपने हाथ में एक सूटकेस लिए एक सुनसान रस्ते से गुज़र रहा है…{कट}
वो रस्ते के बगल में खड़ी एक कार के पास से गुज़रता है {कट}
थोड़ी दूर आने पर फूटपाथ पर बैठे कुत्ते उसे देख कर भोकने लगते हैं {कट}
कुत्तो से बचते बचाते वो अपना पसीना पोछते हुए आगे बढ़ते हुए सडक के मोड़ पर आता है और अचानक संकरी गली से निकलकर एक नकाबपोश बाहर आता है और उस आदमी के पेट में छुरी घुसा कर उसके पेट की भेलपुरी निकल देता है और उसका सूटकेस लेकर फरार हो जाता है…
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चलिए इसी सीन को फिर से इमेजिन कीजिये… सीन नंबर २
एक नकाब पोश किसी शिकार की तलाश में एक अँधेरी गली में छुपा बैठा है {कट}
एक आदमी अपने हाथ में एक सूटकेस लिए एक सुनसान रस्ते से गुज़र रहा है…{कट}
वो आदमी रस्ते के बगल में खड़ी एक कार के पास से गुज़रता है {कट}
थोड़ी दूर आने पर फूटपाथ पर बैठे कुत्ते उसे देख कर भोकने लगते हैं {कट}
नकाबपोश इंसान कुत्तो की आवाज सुनकर अलर्ट होजाता है और अपनी छुरी निकल लेता है {कट}
कुत्तो से बचते बचाते वो आदमी अपना पसीना पोछते हुए आगे बढ़ते हुए सडक के मोड़ पर आता है और अचानक संकरी गली से निकलकर नकाबपोश बाहर आता है और उस आदमी के पेट में छुरी घुसा कर उसके पेट की भेलपुरी निकल देता है और उसका सूटकेस लेकर फरार हो जाता है…
सीन एंड {कट टू}
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खैर आप कहेंगे कि ये बकरपेलू फ्रस्टेट होकर कुछ भी लिखे जा रहा है और खुद के साथ दुसरो का समय बर्बाद कर रहा है हद का बोरिग सीन था… मुर्ख ^&*($%^ कहीं का…
खेर और ज्यादा गाली खाऊं उसके पहले I want to say moral of the story behind the scenes…
जब आप पहला सीन देखेंगे तो आप पाएंगे कि जो आदमी सूटकेस लिए जा रहा है अचानक उस पर हमला होता है और किसी को कुछ समझ आये उसके पहले नकाब पोश सूटकेस लेकर निकल जाता है…
दुसरे सीन में आपको पहले से ही पता है कि एक नकाब पोश किसी शिकार के इंतजार में है और जो आदमी सूटकेस लेकर जा रहा है वो उसके हत्त्थे चढ़ने वाला है और अंततः वो नकाब पोश उस आदमी पर हमला करता है और उसका सूटकेस लेकर निकल जाता है…
यदि आप गौर करें तो पहले सीन में दर्शक अचानक हुए नकाबपोश के हमले से चोंक जाता है और सीन ख़त्म होने के कुछ देर बाद तक अपना सर खुजा कर मन ही मन सोचता है कि ये कैसे हो गया…
जबकि दुसरे सीन में दर्शक नकाब पोश के हमले को लेकर पहले से ही वाकिफ होता है और सूटकेस लिये हुए आदमी हर बढते कदम के साथ दर्शक थ्रिल का अनुभव करता है और जब सीन ख़त्म हो जाता है तो दर्शक अपने पूर्वानुमानो को घटित होते हुए देखकर अच्छा महसूस करता है…
आपने गौर किया ? सीन वही, सीन का लोकेशन वही, कलाकार वही, सीन में प्रयोग होने वाली प्रॉपर्टी {कार, कुत्ते चाकू और सूटकेस} भी वही और शूट किया हुआ फुटेज भी वही लेकिन केवल शॉट्स को ऐड, रिमूव, रीअरेंज या रिप्लेस भर कर देने से एक ही सीन की स्टोरी टेलिंग और इमोशन चेंज हो गया जहाँ पहला सीन आपको अचानक चौंका देता है वही दूसरा सीन आपके अंदर रोमांच और सिहरन पैदा कर देता है…
अब आपका सवाल होगा कि इतनी रामगाथा लिखने की जरूरत क्या थी ?
असल में पिछले कुछ दिनों से “उड़ता पंजाब” फिल्म को लेकर हर खेमे में भसड मची हुई है… पहलाज निहलानी नामक खुरापाती जिसे शायद ही फिल्म मेकिंग और उसकी टेकनीकेलिटी का ज्ञान हो ने फिल्म में ९० कट्स लगाने के लिए कहा है… अब कोई ये बताये कि सिर्फ एक शॉट को हटा देने, या रिप्लेस कर देने से सीन और स्टोरी का अर्थ बदल बदल जाता है उसमे यदि किसी फिल्म में ९० कट्स लगा दिए जाए तो फिल्म का क्या हाल होगा… ये स्थिति जाना था जापान पहुच गए चीन टाइप नही हो जाएगी ?
कुछ जगत होशियार किस्म के लोग सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट दिखाकर ये साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि सेंसर ने सिर्फ १३ चीजो पर आपत्ति जताई है इसलिए केवल १३ कट लगेंगे और ये ९० कट्स की बात अफवाह है…
अब इन्हें कौन समझाए कि अगर फिल्म में किसी कुत्ते का नाम जैकीचैन है तो उसे हटाना केवल एक शॉट भर हटाने का काम नहीं है बल्कि वो कुत्ता २० सीन में होगा तो २० सीन के वो सारे शॉट्स हटाने पड़ेंगे… यदि पंजाब के शहरो का नाम हटाने की बात सेंसर कर रहा है तो पूरी फिल्म में यदि १० अलग अलग सीन में पंजाब का नाम है तो सारे दसियों सीन्स से वो सारे नाम वाले शॉट्स हटाने पड़ेंगे… और यदि किसी शॉट के बेकग्राउंड में पंजाब के किसी शहर का नाम दिखाई दे रहा है और उसी शॉट में कहानी को आगे पुश करने वाली कोई घटना हो रही हो यदि ऐसे में वो शॉट हटा दिया जाये तो क्या कहानी आगे बढ़ सकेगी ? नहीं बिलकुल नहीं… और वैसे भी ये फिल्म अभिषेक चोबे जैसे टेलेंटेड राइटर डायरेक्टर ने लिखी है जो इसके पहले ओमकारा, कमीने, इश्किया जैसी बेहतरीन फिल्मे लिखी हैं.. इस फिल्म के प्रोडूसर अनुराग कश्यप है जो स्टोरी स्क्रीनप्ले की अपनी बारीक समझ के लिए जाने जाते हैं… ऐसे राइटर डायरेक्टर जिनकी फिल्म में हर सीन यहाँ तक की हर शॉट स्टोरी को पुश करता हो ऐसे में ९० शॉट्स निकाल देना उस फिल्म का मर्डर कर देने जैसा है…
फिल्म के एक डायलॉग जिसमे पंजाब के युवाओ को कंजर और जमीन को बंजर कहा गया है से लोगो को आपत्ति है… इस हिसाब से तो बरसो पुरानी फिल्म का CID का गीत “ये है बॉम्बे मेरी जाँ” जिसे हर हिन्दुस्तानी सहित हर मुंबईकर भी बड़े चाव से सुनता है को भी सालो पहले हटा देना चाहिए था… इस गाने में तो मुंबई के लिए और भी ज्यादा आपत्तिजनक शब्द है…
कहीं बिल्डिंग, कहीं ट्रामे, कहीं मोटर, कहीं मिल
मिलता है यहाँ सब कुछ, इक मिलता नहीं दिल
इन्साँ का नहीं कहीं नाम-ओ-निशाँ
ज़रा हट के…
कहीं सट्टा, कहीं पत्ता, कहीं चोरी, कहीं रेस
कहीं डाका, कहीं फाँका, कहीं ठोकर, कहीं ठेस
बेकारों के हैं कई काम यहाँ
ज़रा हट के…
बेघर को आवारा यहाँ कहते हँस-हँस
खुद काटे गले सबके, कहे इसको बिज़नस
इक चीज़ के है कई नाम यहाँ
ज़रा हट के…
इसके अलावा ये देखना भी जरूरी होता है कि कौन सा संवाद किस परिप्रेक्ष्य में कहा गया है प्रसंग और सन्दर्भ क्या है… प्रसंग और सन्दर्भ की भूमिका क्या होती है ये छटवी और सातवी क्लास तक पढ़े किसी भी व्यक्ति को अच्छे से पता होती है… फर्ज कीजिये थ्री इडियट्स का चमत्कार और बलात्कार वाला सीन… यदि किसी इंजिनीअर जिसने वो फिल्म न देखि हो को केवल वो सीन दिखाया जाए न उसके पहले वाला न बाद वाला तो वो उस सीन को इन्जिनिअर्स की बेईज्ज़ती ही बताएगा… यदि कोई डायलॉग फिल्म में है और उस पर आपत्ति है तो ये जानना भी जरूरी है कि किन स्थितियों से गुज़र कर कहानी इस मुकाम तक आई है जिससे अमुक डायलॉग कहने की जरूरत आन पड़ी… इसलिए बिना फिल्म देखे किसी डायलॉग पर हल्ला खड़ा करना मुनासिब नहीं…
असल में फिल्म {सभी फिल्मे नहीं} मनोविज्ञान के महीन बुनावट लिए होती है… किसी फिल्म को देखे बगेर उस पर सवाल उठाना और उसका विरोध करना किसी के भी बाये हाथ का खेल है लेकिन फिल्म बनाना शायद दुनिया के सबसे कठिनतम कामो में से एक हैं… यदि आपको किसी फिल्म से किसी तरह की आपत्ति है तो बजाये हुल्लड़बाजी करने थिएटर में आँग लगाने तोड़ फोड़ करने के आप उस फिल्म के काउंटर में अपनी फिल्म बनाइये… ये तरीका ज्यादा प्रभावी है लेकिन चुकि ये जी तोड़ मेहनत का काम है इसलिए विरोधियो के लिए ये विकल्प हमेशा नेपथ्य में ही रहेगा…