मोहनजो दारो

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लगान और स्वदेश जैसी कमाल की फ़िल्म बनाने वाले आशुतोष गोवारिकर की अगली मेगाबजट फ़िल्म “मोहनजो दारो” का ट्रैलर कल रिलीज हुआ।

मेरी तरह कई लोग इस फ़िल्म का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे होंगे लेकिन कल जब फ़िल्म का ट्रैलर लाँच हुआ तो इसे देख कर मेरी उत्सुकता कुछ ही मिनिट में ही काफूर होने लगी।

हालाँकि फ़िल्म के सेट्स कॉस्ट्यूम और प्रोपर्टीस पर कुछ नही कहना उचित नही होगा क्योकि गोवारिकर जैसे डायरेक्टर भरपूर रिसर्च करके ही किसी नतीजे पर पहुचते हैं। फ़िल्म के निराश करने वाला पहलू इसके डॉयलॉग्स में ही नज़र आया।

फ़िल्म के डॉयलॉग्स में उर्दू के शब्दों सौदा, रद्द, तहस नहस जियेगा मरेगा के अतिरिक्त अन्य शब्दों का जम कर प्रयोग किया है जबकि ट्रेलर में ही इस बात को लिखित में बताया कि ये कहानी मुगल्स जीसस और बुद्ध से पहले की है।

चूँकि देखा जाय तो उस सभ्यता के समय हिन्दी का वर्तमान स्वरूप भी अस्तित्व में नही था लेकिन फ़िल्म के सेट्स, कॉस्ट्यूम और मैकअप आपको थोडा रिएलिटी के करीब तो लाते है लेकिन हिन्दी के बीच घुसे उर्दू के शब्द आपको खीच कर रिएलिटी से दूर छिटक देते हैं। उर्दू के शब्द संवादों में वैसे ही खटकते हैं जैसे आँखों में तिनका खटकता है। यदि गोवारिकर ने उर्दू के शब्द इसलिए प्रयोग किये ताकि समझने वाले को आसानी हो तो ये गोवारीकर की भूल ही कही जाएगी क्योकि चीजो को सरल करने में फैक्ट के साथ समझोता कतई नही होना चाहिए।

क्या होता यदि लगान का भूवन और बाकि कलाकार बृज,अवधि बोली की जगह हिन्दी के डायलॉग बोलते या जोधा अकबर का अकबर हिन्दी के शब्दों का प्रयोग करता।

शुद्ध हिन्दी का प्रयोग आपको अपेक्षाकृत ज्यादा पुरातन काल में ले जाता है बनिस्बत उर्दू के। आप कितनी ही पुराने समय की फ़िल्म क्यों न देख रहे हों उर्दू के शब्द सुनते ही आपका एहसास मुग़ल काल पर आकर छिटक जाता है।

जो भी हो बिना पूरी फ़िल्म देखे बगैर कुछ भी कहा नही जा सकता लेकिन फ़िल्म में उर्दू जबान ने एक असहज भाव तो पैदा कर ही दिया है।

Trailer Mohenjo Daro

दो पहियों पर दौड़ती फोर व्हीलर : उड़ता पंजाब

udta-punjab-trailer-0001दुनिया के किसी भी डेमोक्रेटिक देश में जब भी अपराध अमर बेल की तरह समाज को धीरे धीरे जकड़ते हुए अपनी गिरफ़्त में लेता है तो इसके पीछे हमेशा P4 फ़ैक्टर की गैरजिम्मेदारी और अनदेखी काम करती है।
P4 फ़ैक्टर की भूमिका किसी भी डेमोक्रेटिक देश में कार के 4 पहियों की तरह होती है। यदि किसी कार में चार पहियो में से एक भी पहिये में अपने मूल स्वरूप से अलग रत्ती भर भी बिगाड़ होता है तो इसका असर कार की ड्राइविंग पर साफ़ देखा जाता है।

यहाँ P4 फ़ैक्टर से मतलब : Police, prosecution, politician, press से है।

इस लिहाज से उड़ता पंजाब दो पहियो पर दौड़ती फोर व्हिलर के सामान दिखती है जिसमे पंजाब की गलियों में ड्रग्स के फैलते कारोबार को केवल पॉलिटिकल और एडमिनिस्ट्रेशन के गठजोड़ का परिणाम बताया है जबकि इतने व्यापक ड्रग्स माफिया के खड़े होने में जुडिशल और प्रेस की अनदेखी कहीं अधिक व्यापक होती है। बेहतर होता कि अभिषेक चौबे मीडिया और जुडिशल फैक्टर को भी ड्रग के कारोबार में उनकी भूमिका को जगह देते इसके लिए ज्यादा नही सिर्फ कहानी में सिर्फ 2 से 3 सीन जोड़ कर ये काम किया जा सकता था।

मुकम्मल रिसर्च की कमी की कमी से बॉलीवुड को निकलने में अभी भी समय लगेगा। फ़िल्म को या तो ड्रग्स के कारोबार में पॉलिटिकल एजेंडे तक सीमित रखा जा सकता था या P4 फ़ैक्टर को पूरा करके कहानी कही जा सकती थी। USA में ड्रग्स के कारोबार पर एक बहुत बेहतरीन सीज़न “Breaking Bad” बन चुका है। इस सीजन में कहानी को ड्रग्स माफिया और नार्कोटिक्स डिपार्टमेंट की नूरा कुश्ती के इर्द-गिर्द बुना गया था, खेर BB के 45 मिनिट के 72 एपिसोड्स की तुलना 2.5 घँटे की फ़िल्म से करना मुनासिब नही होगा।

फ़िल्म को देखकर ये कंफ्यूजन होता है कि अभिषेक चौबे fiction का documentation कर रहे थे या documentation को fictionalized… किसी डॉक्यूमेंटेशन को किस बेहतरी से fictionalized किया जाता है ये मार्टिन स्कोरसिस की “कैसिनो” और कुछ हद तक “गैंग्स ऑफ़ वासेपुर” से सीखा जा सकता है।

फ़िल्म की कहानी 3 अलग अलग घटनाक्रमो के जरिये आगे बढ़ती है। आलिया भट्ट जिसका फ़िल्म में कोई नाम नही है वो पाकिस्तान से आये ड्रग्स को बेचने के चलते माफिया के चँगुल में फंसी है, सरताज यानि दिलजीत अपने छोटे भाई के ड्रग्स की लत से क्षुब्ध होकर पूरे ड्रग रैकेट का भांडा फोड़ना चाहता है जिसमे डॉक्टर प्रीत साहनी यानी करीना कपूर उसकी मदद करती है, टॉमी सिंह यानी शाहिद कपूर जो कि पॉप स्टार है जिसे ये गिल्ट है कि उसकी नकल करके नए लड़के ड्रग्स के नशे में अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहे हैं और वो आलिया भट्ट को उन माफिया के चँगुल से छुड़ा कर अपने नैराश्य से छुटकारा पाना चाहता है। फ़िल्म के तीनो घटनाक्रम बेहतरीन बुनावट के जरिये अंत में जाकर एक साथ मिलते है।

फ़िल्म में टॉमी सिंह के किरदार में शाहिद कपूर ने जान डाल दी है ये किरदार हैदर के बाद उनका सबसे बेहतरीन किरदार माना जा सकता है। सरताज के किरदार में दिलजीत ने पूरा न्याय किया डॉक्टर प्रीत के किरदार में करीना भी पूरी फ़िल्म में कहीं निराश नही करती हैं। ये कहना कतई अतिश्योक्ति नही होगा कि आलिया भट्ट पूरी फ़िल्म का सबसे बड़ा प्लस फ़ैक्टर है। जब जब भी आलिया पर्दे पर आती है तब उसके आसपास कौन सा किरदार है इससे फर्क नही पड़ता क्योकि हर बार दर्शक का अटेंशन केवल आलिया ही पर ही होता है कारण सिर्फ एक कमाल का अभिनय।

फ़िल्म सीन दर सीन एक ही पेस पर चलती है फ़िल्म में ज्यादा उतार चढ़ाव नही है बावजूद इसके कहानी बाँधने की कोशिश करती ही है फ़िल्म की एडिटिंग थोड़ी ढीली किस्म की है जो बेहतर की जा सकती थी।

फ़िल्म का गाना जो कि अमित त्रिवेदी ने कम्पोज किया है “इक कुड़ी जी का नाम मोहब्बत है गुम है-3” इतना बेहतरीन बन पड़ा है जिसे बार बार सुनने का मन करता है इस गाने में किसी अलौकिक ताकत होने का एहसास सुनते समय होता है।

पंजाब की लोकेशन और ड्रग्स कल्चर को अभिषेक चौबे ने कहानी के साथ गूँथने की कामयाब कोशिश की है यही कारण है कि पूरी फ़िल्म में कही भी न लस्सी के गिलास नज़र आते हैं न पँजाबी खाना और न ही गाय भैसो के झुंड वरना क्या लस्सी और उड़द के लड्डूओं के बगैर पंजाब की कल्पना सम्भव है ? खांटी पंजाबी कल्चर की गैरमौजूदगी ही फ़िल्म को थोडा रियलिस्टिक बनाती है। राजीव रवि की सिनेमेटोग्राफी उनकी पिछली फिल्मो से कमतर लगी।

फ़िल्म को आलिया भट्ट की बेजोड़ एक्टिंग के लिए याद रखा जाएगा बाकी फ़िल्म औसत से कुछ अंश ही बेहतर है। फ़िल्म में वैसा भी कुछ नही निकला जैसा कि इससे जुड़े विवादों के समय दावा किया गया था हाँ कुछ जगह ऐसा जरूर लगता है कि गालियो को बेवजह ठूँसा गया है ये इसलिए लगता है कि कई जगह गालियों के जरिये ही रियलिटी को थोपने की कोशिश की गई है।

खैर फ़िल्म को सभी एक्टर्स की अच्छी एक्टिंग के साथ और म्यूजिक के लिए देखा जा सकता है लेकिन यदि फ़िल्म के जरिये आप ड्रग्स इंडस्ट्री के स्याह अँधेरे में छुपी सच्चाइयो को खोजने जाएंगे तो आपको निराश होना पड़ सकता है क्योकि ड्रग्स बनाने उसमे यूज़ होने वाले केमिकल्स उसको उपयोग करने की मैथर्ड सम्बन्धी कंटेंट इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध है। फ़िल्म में जो कुछ जानने लायक है वो ये कि पाकिस्तान में ड्रग ट्रैफिकिंग के लिए उनके डिस्क थ्रो एथलीट से कैसे काम लिया जाता है और पंजाब के ड्रग्स कारोबार में मध्यप्रदेश के नीमच का कितना बड़ा कनेक्शन है।

उड़ता सेंसर और रेंगता पंजाब

13346738_10206129138497867_6026624832772338907_nचलिए फिल्म के एक सीन को इमेजिन कीजिये… सीन नंबर १

रात में एक आदमी अपने हाथ में एक सूटकेस लिए एक सुनसान रस्ते से गुज़र रहा है…{कट}

वो रस्ते के बगल में खड़ी एक कार के पास से गुज़रता है {कट}

थोड़ी दूर आने पर फूटपाथ पर बैठे कुत्ते उसे देख कर भोकने लगते हैं {कट}

कुत्तो से बचते बचाते वो अपना पसीना पोछते हुए आगे बढ़ते हुए सडक के मोड़ पर आता है और अचानक संकरी गली से निकलकर एक नकाबपोश बाहर आता है और उस आदमी के पेट में छुरी घुसा कर उसके पेट की भेलपुरी निकल देता है और उसका सूटकेस लेकर फरार हो जाता है…

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चलिए इसी सीन को फिर से इमेजिन कीजिये… सीन नंबर २

एक नकाब पोश किसी शिकार की तलाश में एक अँधेरी गली में छुपा बैठा है {कट}

एक आदमी अपने हाथ में एक सूटकेस लिए एक सुनसान रस्ते से गुज़र रहा है…{कट}

वो आदमी रस्ते के बगल में खड़ी एक कार के पास से गुज़रता है {कट}

थोड़ी दूर आने पर फूटपाथ पर बैठे कुत्ते उसे देख कर भोकने लगते हैं {कट}

नकाबपोश इंसान कुत्तो की आवाज सुनकर अलर्ट होजाता है और अपनी छुरी निकल लेता है {कट}

कुत्तो से बचते बचाते वो आदमी अपना पसीना पोछते हुए आगे बढ़ते हुए सडक के मोड़ पर आता है और अचानक संकरी गली से निकलकर नकाबपोश बाहर आता है और उस आदमी के पेट में छुरी घुसा कर उसके पेट की भेलपुरी निकल देता है और उसका सूटकेस लेकर फरार हो जाता है…

सीन एंड {कट टू}

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खैर आप कहेंगे कि ये बकरपेलू फ्रस्टेट होकर कुछ भी लिखे जा रहा है और खुद के साथ दुसरो का समय बर्बाद कर रहा है हद का बोरिग सीन था… मुर्ख ^&*($%^ कहीं का…

खेर और ज्यादा गाली खाऊं उसके पहले I want to say moral of the story behind the scenes…

जब आप पहला सीन देखेंगे तो आप पाएंगे कि जो आदमी सूटकेस लिए जा रहा है अचानक उस पर हमला होता है और किसी को कुछ समझ आये उसके पहले नकाब पोश सूटकेस लेकर निकल जाता है…

दुसरे सीन में आपको पहले से ही पता है कि एक नकाब पोश किसी शिकार के इंतजार में है और जो आदमी सूटकेस लेकर जा रहा है वो उसके हत्त्थे चढ़ने वाला है और अंततः वो नकाब पोश उस आदमी पर हमला करता है और उसका सूटकेस लेकर निकल जाता है…

यदि आप गौर करें तो पहले सीन में दर्शक अचानक हुए नकाबपोश के हमले से चोंक जाता है और सीन ख़त्म होने के कुछ देर बाद तक अपना सर खुजा कर मन ही मन सोचता है कि ये कैसे हो गया…

जबकि दुसरे सीन में दर्शक नकाब पोश के हमले को लेकर पहले से ही वाकिफ होता है और सूटकेस लिये हुए आदमी हर बढते कदम के साथ दर्शक थ्रिल का अनुभव करता है और जब सीन ख़त्म हो जाता है तो दर्शक अपने पूर्वानुमानो को घटित होते हुए देखकर अच्छा महसूस करता है…

आपने गौर किया ? सीन वही, सीन का लोकेशन वही, कलाकार वही, सीन में प्रयोग होने वाली प्रॉपर्टी {कार, कुत्ते चाकू और सूटकेस} भी वही और शूट किया हुआ फुटेज भी वही लेकिन केवल शॉट्स को ऐड, रिमूव, रीअरेंज या रिप्लेस भर कर देने से एक ही सीन की स्टोरी टेलिंग और इमोशन चेंज हो गया जहाँ पहला सीन आपको अचानक चौंका देता है वही दूसरा सीन आपके अंदर रोमांच और सिहरन पैदा कर देता है…

अब आपका सवाल होगा कि इतनी रामगाथा लिखने की जरूरत क्या थी ?

udta-punjab-posterअसल में पिछले कुछ दिनों से “उड़ता पंजाब” फिल्म को लेकर हर खेमे में भसड मची हुई है… पहलाज निहलानी नामक खुरापाती जिसे शायद ही फिल्म मेकिंग और उसकी टेकनीकेलिटी का ज्ञान हो ने फिल्म में ९० कट्स लगाने के लिए कहा है… अब कोई ये बताये कि सिर्फ एक शॉट को हटा देने, या रिप्लेस कर देने से सीन और स्टोरी का अर्थ बदल बदल जाता है उसमे यदि किसी फिल्म में ९० कट्स लगा दिए जाए तो फिल्म का क्या हाल होगा… ये स्थिति जाना था जापान पहुच गए चीन टाइप नही हो जाएगी ?

कुछ जगत होशियार किस्म के लोग सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट दिखाकर ये साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि सेंसर ने सिर्फ १३ चीजो पर आपत्ति जताई है इसलिए केवल १३ कट लगेंगे और ये ९० कट्स की बात अफवाह है…

अब इन्हें कौन समझाए कि अगर फिल्म में किसी कुत्ते का नाम जैकीचैन है तो उसे हटाना केवल एक शॉट भर हटाने का काम नहीं है बल्कि वो कुत्ता २० सीन में होगा तो २० सीन के वो सारे शॉट्स हटाने पड़ेंगे… यदि पंजाब के शहरो का नाम हटाने की बात सेंसर कर रहा है तो पूरी फिल्म में यदि १० अलग अलग सीन में पंजाब का नाम है तो सारे दसियों सीन्स से वो सारे नाम वाले शॉट्स हटाने पड़ेंगे… और यदि किसी शॉट के बेकग्राउंड में पंजाब के किसी शहर का नाम दिखाई दे रहा है और उसी शॉट में कहानी को आगे पुश करने वाली कोई घटना हो रही हो यदि ऐसे में वो शॉट हटा दिया जाये तो क्या कहानी आगे बढ़ सकेगी ? नहीं बिलकुल नहीं… और वैसे भी ये फिल्म अभिषेक चोबे जैसे टेलेंटेड राइटर डायरेक्टर ने लिखी है जो इसके पहले ओमकारा, कमीने, इश्किया जैसी बेहतरीन फिल्मे लिखी हैं.. इस फिल्म के प्रोडूसर अनुराग कश्यप है जो स्टोरी स्क्रीनप्ले की अपनी बारीक समझ के लिए जाने जाते हैं… ऐसे राइटर डायरेक्टर जिनकी फिल्म में हर सीन यहाँ तक की हर शॉट स्टोरी को पुश करता हो ऐसे में ९० शॉट्स निकाल देना उस फिल्म का मर्डर कर देने जैसा है…

फिल्म के एक डायलॉग जिसमे पंजाब के युवाओ को कंजर और जमीन को बंजर कहा गया है से लोगो को आपत्ति है… इस हिसाब से तो बरसो पुरानी फिल्म का CID का गीत “ये है बॉम्बे मेरी जाँ” जिसे हर हिन्दुस्तानी सहित हर मुंबईकर भी बड़े चाव से सुनता है को भी सालो पहले हटा देना चाहिए था… इस गाने में तो मुंबई के लिए और भी ज्यादा आपत्तिजनक शब्द है…

कहीं बिल्डिंग, कहीं ट्रामे, कहीं मोटर, कहीं मिल
मिलता है यहाँ सब कुछ, इक मिलता नहीं दिल
इन्साँ का नहीं कहीं नाम-ओ-निशाँ
ज़रा हट के…

कहीं सट्टा, कहीं पत्ता, कहीं चोरी, कहीं रेस
कहीं डाका, कहीं फाँका, कहीं ठोकर, कहीं ठेस
बेकारों के हैं कई काम यहाँ
ज़रा हट के…

बेघर को आवारा यहाँ कहते हँस-हँस
खुद काटे गले सबके, कहे इसको बिज़नस
इक चीज़ के है कई नाम यहाँ
ज़रा हट के…

इसके अलावा ये देखना भी जरूरी होता है कि कौन सा संवाद किस परिप्रेक्ष्य में कहा गया है प्रसंग और सन्दर्भ क्या है… प्रसंग और सन्दर्भ की भूमिका क्या होती है ये छटवी और सातवी क्लास तक पढ़े किसी भी व्यक्ति को अच्छे से पता होती है… फर्ज कीजिये थ्री इडियट्स का चमत्कार और बलात्कार वाला सीन… यदि किसी इंजिनीअर जिसने वो फिल्म न देखि हो को केवल वो सीन दिखाया जाए न उसके पहले वाला न बाद वाला तो वो उस सीन को इन्जिनिअर्स की बेईज्ज़ती ही बताएगा… यदि कोई डायलॉग फिल्म में है और उस पर आपत्ति है तो ये जानना भी जरूरी है कि किन स्थितियों से गुज़र कर कहानी इस मुकाम तक आई है जिससे अमुक डायलॉग कहने की जरूरत आन पड़ी… इसलिए बिना फिल्म देखे किसी डायलॉग पर हल्ला खड़ा करना मुनासिब नहीं…

असल में फिल्म {सभी फिल्मे नहीं} मनोविज्ञान के महीन बुनावट लिए होती है… किसी फिल्म को देखे बगेर उस पर सवाल उठाना और उसका विरोध करना किसी के भी बाये हाथ का खेल है लेकिन फिल्म बनाना शायद दुनिया के सबसे कठिनतम कामो में से एक हैं… यदि आपको किसी फिल्म से किसी तरह की आपत्ति है तो बजाये हुल्लड़बाजी करने थिएटर में आँग लगाने तोड़ फोड़ करने के आप उस फिल्म के काउंटर में अपनी फिल्म बनाइये… ये तरीका ज्यादा प्रभावी है लेकिन चुकि ये जी तोड़ मेहनत का काम है इसलिए विरोधियो के लिए ये विकल्प हमेशा नेपथ्य में ही रहेगा…

माँ के प्रति अपनी नफरत को बदले प्रेम में, मूल्य सिर्फ ५० रु मात्र…

I hate you mom

I hate you mom

I hate you mom

I hate you

यदि आप २४ में से १-२ घंटे भी टीवी देखने में बिताते हैं तो पिछले ४-५ दिनों में ऊपर लिखी ये पंक्तिया आपके कानो में ज़रूर गूंजी होगी… ये शब्द एक टीवी विज्ञापन जो कि ब्लड प्यूरीफायर सिरप हमदर्द की “साफ़ी” का है… इसमें बताया गया है कि कुछ लडकियां जो अपने चेहरे पर उभरे मुहासों और उनके दागो से परेशान हैं… अपनी खूबसूरती पर लगे इस दाग के लिए ये लड़कियां अपनी माँ को जिम्मेदार बताती है इसका कुतर्क कुछ यूँ बताया जाता है कि

“कहते हैं कि रूप माँ से मिलता है, ये रूप?” ये लाइन एक लड़की मुहासों से घिरा अपना चेहरा दुनिया को दिखाते हुए कहती है…

“मम्मी की स्किन इतनी फ्लोलेस और मेरी ?” दूसरी लड़की ये लाइन कहती है…

“माँ बेटी…? अरे ये तो बहने लगती हैं”

“संगमरमर जैसी स्किन वाली माँ की खुरदुरी बेटी”

“पिम्पल क्वीन”

“स्कारफेस” “मून सरफेस” “हेरेडीट्री” “डीएनए”

सब झूठ है… “तुमने नही दिया मुझे अपना रूप माँम”

I hate you mom

I hate you mom

I hate you mom

I hate you

इसके बाद एक कमर्शिअल वौइस् ओवर आता है “अपना दोष माँ पर, उनका वक़्त और था आपका और है, अपनाइए हमदर्द की साफ़ी……..ब्ला, ब्ला, ब्ला”

इसके बाद सभी लड़कियों के चेहरे पर नूर बरसने लगता है और वो लड़की जो I hate you mom कह रही थी वो I love you mom कहने लगती हैं…

जब इस विज्ञापन को गौर से देखा जाये तो इसके अन्दर रचे बसे पाश्च्यात मनोविज्ञान को आसानी से समझा जा सकता है… क्या एक माँ और बेटी के बीच में प्रेम का आधार सिर्फ साफ़ चेहरा और निखरी रंगत ही है…? क्या जो लडकिया खुबसूरत नहीं होती वो अपनी माँ से प्रेम नहीं करती ? या हर खुबसूरत लड़की का अपनी माँ से प्रेमपूर्ण सम्बन्ध होना अंतिम सत्य माना जा सकता है ? क्या ये स्थापित सत्य है कि खुबसूरत माँ की लड़की खुबसूरत ही होती है ? क्या कभी बेटी माँ से ज्यादा सुन्दर नहीं हो सकती ? क्या कृतिम साधनों से खुबसूरती प्राप्त करके प्रेम भी पैदा किया जा सकता है ? यदि इस विज्ञापन की फिलोसफी को आधार बना कर इन सवालो का जवाब खोजें तो जवाब “हाँ” में आएगा…

असल में जैसे-जैसे इंसान की गति ह्रदय से दूर होते हुए मस्तिष्क की और बहने लग जाती है तब-तब प्रेम और अध्यात्म की सारी व्यवस्थाएं भौतिकवाद से प्रभावित होने लग जाती है, प्रेम का आधार अकारण न रह कर कारण आधारित रह जाता है… कभी कभी ये कारण बड़े क्षुद्र और हास्यास्पद होते हैं… यदि आकर्षण और प्रेम किसी कारण से पैदा हो सकता है तो इस बात की ९९% सम्भावना है कि कारण की समाप्ति के साथ ही उस आकर्षण और प्रेम की भी समाप्ति भी हो जायेगी… कारण आधारित प्रेम कारण की समाप्ति के साथ ही दम तोड़ देता है…

माँ और उसकी संतान के बीच पनपा प्रेम करुणा और वात्सल्य से पनपता है न कि किसी ख़ूबसूरती और बदसूरती जैसे भौतिक कारण से खैर विज्ञापन की फिलोसफी को आधार बनाएँ तो लब्बोलुआब यही है कि हमदर्द की साफ़ी माँ के प्रति बेटी की नफरत को प्रेम में बदल सकती है वो भी सिर्फ ५०-६० रूपये जैसी कम कीमत में…

कभी न टूटने वाली जिद की सच्ची दास्तान : UNBROKEN

पुनरावृत्ति एक ऐसी शैली है जिससे किसी भी नयी आदत को अपनाने या पुरानी को छोड़ने में मदद मिलती है… पुनरावृत्ति चाहे सचेतन हो या परिस्थितिजन्य, दोनों ही स्थिति के शुरुआती दौर में कष्ट का अनुभव होता है लेकिन समय बीतने के साथ हमारा मन उस नयी विधा को स्वीकार कर लेता है और आदत में तब्दील करने साथ ही कष्ट को सहजता में परिवर्तित कर देता है… अचेतन स्वीकारोक्ति की अवधि, समय काल और परिस्थितियों पर निर्भर करती
है… यदि १०-१५ साल पुराने किसी इंजिनियरिंग या मेडिकल स्टूडेंट से पूछे तो वो बताएगा कि रेगिंग के दौरान जब उन्हें १०० से अधिक थप्पड़ खाने पड़ते थे तब, शुरुआत के १०-१५ थप्पड़ों के बाद हर थप्पड़ से होने वाला दर्द या कष्ट कम होता चला जाता है और ५० थप्पड़ो के बाद दर्द का एहसास ही ख़त्म हो जाता है… इंसान के शरीर में दर्द की पुनरावृत्ति समय बीतने के बाद उस 
शरीर के अभिन्न अंग की तरह हो जाती है… पुनरावृत्ति की यही शैली ज़िन्दगी के हर छोटे बड़े पहलू को प्रभावित करती है… कभी कभी दुर्भाग्य से इंसान ऐसी मुसीबतों में घिर जाता है जहाँ उसकी हर कोशिश नाकाम होने लगती है लेकिन समय बीतने के साथ उसकी कोशिशों से मुसीबतों की तीव्रता कम होकर परेशानी में और Unbroken_704परेशानी सामान्य अवस्था में बदल जाती है… चूँकि मुसीबत, परेशानी या सामान्य अवस्था ये तीनो ही मानसिक स्थितियां हैं फर्क बस किसी भी घटनाक्रम के विभिन्न नज़रियों या घटनाक्रम में बिताए हुए समय से उत्पन्न होता है… “UNBROKEN” एक व्यक्ति की खुशनुमा ज़िन्दगी में आई मुसीबत, मुसीबत से परेशानी, परेशानी से सामान्य अवस्था और फिर दुबारा खुशनुमा ज़िन्दगी तक के सफ़र को बयां करती है…

दुसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी फाइटर प्लेन जापानी टापुओं पर बमबारी कर रहे हैं इनमें से एक प्लेन में Louis Zamperini अपने कुछ साथियों के साथ बमबारी में साथ दे रहा है…

{फ़्लैशबेक} Louis Zamperini की उम्र 10-12 साल है… Louis की हरकतों, मसलन सिगरेट,शराब,चोरीunbroken-official-trailer-2-hd-1200x630-1 आदि से उसके माता-पिता को काफी शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है… एक दिन खेल के मैदान में Louis को तेजी से दौड़ते हुए उसका बड़ा भाई Peter देखता है और Louis के अन्दर छुपे एथलीट को पहचान लेता है वो Louis को एथलीट की ट्रेनिंग देना शुरू कर देता है और समय के साथ Louis “The Torrance Tornado”  नामक प्रसिद् रनर एथलीट बन जाता है… वो जर्मनी के समर ओलंपिक में 5000 मीटर की रेस में 8वे स्थान पर आने के बावजूद रिकॉर्ड बना देता है…

Making_of_Unbroken_7_embed copy{वर्तमान} Louis के फाइटर प्लेन का इंजन बीच समुद्र के ऊपर जाकर फेल हो जाता है और प्लेन समुद्र में क्रेश हो जाता है इस क्रेश में Louis और 2 लोग Mac और Phil ही जिन्दा बचते है… 3 दिन बाद एक खोजी प्लेन वहां से निकलता है लेकिन वो लोग उस प्लेन का ध्यान खीचने में नाकाम रहते हैं… खुद को जिन्दा रखने के लिए वो पक्षी और मछलियों को मारकर खाते हैं और बारिश के पानी को पीने के लिए इस्तेमाल करते हैं… 27 दिन बाद एक प्लेन उनके बेहद करीब से गुज़रता है और तीनो इशारे से उस प्लेन का ध्यान अपनी तरफ खीचते हैं लेकिन वो प्लेन उन्हें बचाने की बजाय उन पर गोलियां दागना शुरू कर देता है क्योकि वो जापानी फाइटर प्लेन होता है, Unbrokenतीनो समुद्र में कूद कर अपनी जान बचाते हैं… 33वे दिन Mac जिंदगी की जंग हार जाता है और केवल Louis और Phil ही जिन्दा बचते हैं… 45वे दिन दोनों को एक जापानी युद्धपौत के सेनिको द्वारा बंदी बना लिया जाता है और दोनों को जापान के अलग अलग detention camp {युधबंदीयों के शिविर} में भेज दिया जाता है… Louis को टोकियो के केम्प में लाया जाता है इस कैंप का दायित्व जापानी सार्जेंट Mutsuhiro Watanabe के पास होता है जो कि बहुत क्रूर और निर्दयी है और अपने इसी स्वाभाव की वजह से उसे “Bird” नाम से जाना जाता है… सार्जेंट Watanabe, Louis पर सबसे ज्यादा जुल्म करता है और उसे  जलन की भावना रखता है क्योकि Louis एक एथलीट UNRBROKEN-articleLarge-v2है और उसे उसमे हार न मानने वाली इच्छाशक्ति दिखाई देती है… २ साल के बाद सार्जेंट Watanabe का प्रमोशन हो जाता है और वो उस कैंप से चला जाता है… एक दिन अमेरिकी बमबारी में उनका कैंप तबाह हो जाता है इसलिए सारे युद्ध बंदियों को ट्रेन में भर कर दुसरे कैंप ले जाया जाता है जो कि एक कोयले की बहुत बड़ी खदान है… दुर्भाग्य से यहाँ पर Louis और बाकी कैदियों का सामना दोबारा सार्जेंट Watanabe से होता है जो उस खदान का ऑफिसर है… यहाँ कैदी दिन रात कोयला ढोते हैं और एक दिन Louis के पैर में चोट लग जाती है और सार्जेंट Watanabe चोट के बावजूद उससे एक बहुत भारी लकड़ी का टुकड़ा उठाने को कहता है और अपने जवान को ऑर्डर देता है कि अगर Louis उसे लकड़ी को गिरा दे तो वो उसे शूट कर दे लेकिन दृढ इच्छाशक्तिAngelina Jolie- Unbroken-2014-Review लिए Louis उसे लड़खड़ाते हुए अपने सर के ऊपर उठा लेता है और सार्जेंट Watanabe की आँखों में आँखे डाल कर कभी हार न मानने की मंशा जाता देता है और उसकी इस हरकत से बौखलाया सार्जेंट Watanabe उसे बेरहमी से पीटने लगता है… कुछ दिनों के बाद युद्ध विराम हो जाता है और सभी कैदियों को छोड़ दिया जाता है…

“UNBROKEN” का अर्थ है “जिसे तोड़ा न जा सके”, पूरी फिल्म को यदि एक शब्द में परिभाषित करना हो तो इस शब्द से बेहतर कोई और शब्द नहीं हो सकता… फिल्म के सन्दर्भ में इस शब्द की उपयोगिता कभी भी और कितनी ही बुरी परिस्थिति में हार न मानने वाली दृढ इच्छाशक्ति से समझी जा सकती है… ये फिल्म Louis के पल पल की maxresdefaultजिजीविषा का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है… फिल्म दर्शकों को कभी हार नहीं मानने का सन्देश देने में कामयाब रहती है… फिल्म में ऐसे बहुत से सीन है जो विचलित करने के साथ वास्तविकता का एहसास कराते हैं, मसलन जब Louis, Mac और Phill समन्दर के बीच फंस जाते हैं तो वे अपनी भूख मिटाने के लिए पक्षियों और मछलियों का शिकार करते हैं और कच्चा मांस खाते हैं… चूँकि समुद्र में 45 दिन तक फंसे हुए इंसान में जिन्दा रहने के लिए अटूट विश्वास और सकारात्मकता का होना बहुत जरूरी है इसलिए समुद्र में फंसे तीनो लोगो में Mac जिसका दृष्टिकोण शुरुआत से ही थोडा नकारात्मक होता है वो 33 वे दिन ही दम तोड़ देता है लेकिन बाकी दोनों Louis और Phill जिन्दा रहते हैं…

फिल्म में कई सीन बहुत मार्मिक हैं जैसे कि जब तीनो समुद्र में आये तेज तूफ़ान से जद्दोजहद करते हैं और जब सार्जेंट Watanabe केम्प के सभी बंदियों से Louis के चेहरे पर पंच मारने को कहता है और कैदी न चाहते हुए भी Louis को मारते हैंunborken620350 और आत्मग्लानि महसूस करते हैं… फिल्म के अंतिम दृश्यों में एक और सीन जिसमे सार्जेंट Watanabe, Louis  को पैर में चोट होने के बावजूद एक भारी भरकम लकड़ी उठाने को कहता है और न उठाने या गिरा देने की स्थिति में उसे शूट करने का ऑर्डर देता है तो खदान के बाकी मजदूर और सैनिक अपनी जगह ठहर जाते हैं और Louis को देखने लगते हैं Louis लड़खड़ाते हुए लकड़ी को उठा लेता है जिसे देखकर हर कोई अचंभित रह जाता है और सार्जेंट Watanabe अपनी इस हार को पचा नही पाता और Louis को जानवरों की तरह मारने लगता है… इसके अलावा एक सीन में जब Louis को २ साल के लम्बे अंतराल के बाद कैंप से बहार टोकियो स्थित रेडिओ स्टेशन पर आया जाता है तो लिफ्ट से निकलती हुई लड़की को Louis ऐसे देखता है जैसे वो कोई अजूबा हो…

फिल्म के कुछ संवाद {अनुवादित} लार्जर देन लाइफ जैसे हैं जैसे : “अगर तुम झेल सकते हो तो तुम खेल सकते हो” या “दर्द के एक पल की कीमत पूरी ज़िन्दगी का आनंद होता है, दुश्मन को अंत तक जिन्दा रह कर ही हराया जा सकता है.  

WWII-Japanese-prison-camp-in-Anglina-Jolies-Unbroken-2014फिल्म के तकनीकी पक्ष का सबसे मजबूत पहलू इसकी सिनेमेटोग्राफी है… फिल्म के सभी सीन चाहे वो युद्ध के हों, समुद्र के तूफ़ान के या युद्ध बंदियों को कोयले की खान तक लेजाने वाले सफ़र शॉट्स हों सभी को बेहतरीन तरीके से फिल्माया गया है… इस फिल्म की बेहतरीन सिनेमेटोग्राफी के लिए फिल्म को ऑस्कर में सिनेमेटोग्राफी का नोमिनेशन मिला था…

सच्ची घटनाओ पर आधारित ये फिल्म जो कि Unbroken नाम के ही एक नॉन फिक्शन नॉवल से ली गयी है… दिसंबर 2014 में रिलीज़ हुई इस फिल्म की निर्माता-निर्देशक हालीवुड की मशहूर अभिनेत्री Angelina Jolie हैं… फिल्म का स्क्रीनप्ले ऑस्कर अवार्ड विनर मशहूर फिल्मकार जोड़ी Coen Brothers ने लिखा है जिन्होंने unbroken-4No Country For Old Man और True Grit जैसी बेहतरीन फिल्मे बनाई हैं… फिल्म के सिनेमेटोग्राफर Roger Deakins है जिन्होंने Coen Brothers की लगभग सभी फिल्मो में सिनेमेटोग्राफी का जिम्मा संभाला है और “A Beautiful Mind” और  “The Assassination of Jesse James” जैसी बेहतरीन फिल्मो की सिनेमेटोग्राफी की है और अभी तक 12 फिल्मो के लिए ऑस्कर में नोमिनेट हो चुके हैं और 3 बाफ्टा अवार्ड सहित 8 अवार्ड जीत चुके हैं…

n37G2DCLouis का किरदार निभाने वाले Jack O’Connell ने पूरी फिल्म को उपने कंधो पर संभाला है, जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे Louis के किरदार को Jack O’Connell ने पूरी विश्वसनीयता के साथ अंजाम दिया… Jack O’Connell के चेहरे की मासूमियत दर्शक को भावुक कर देती है और जद्दोजहद उत्साह भर देती है जबकि सार्जेंट Mutsuhiro Watanabe का किरदार निभाने वाले Miyavi फिल्म का दूसरा पिलर कहे जा सकते हैं Miyavi के चेहरे के भाव ८०% एक जैसे ही रहे, चूँकि सार्जेंट Mutsuhiro Watanabe का किरदार युध्बंदियों के प्रति नफरत भरा और क्रूर था इसलिए ये दोहराव जरूरी लगता है…download (1)

“Unbroken” हर लिहाज से एक बेहतरीन फिल्म कही जा सकती है, यदि आप सोचते हैं कि आपकी जिंदगी में कुछ उत्साह नहीं है या आपको आपकी वर्तमान जिंदगी और परिस्थितियों से आप नाखुश है तो एक बार ये फिल्म देख लें तो आपको समझ आएगा कि परिस्थितिया कितनी बद से बद्तर हो सकती हैं और उन परिस्थितियों की तुलना में आपकी वर्तमान जिंदगी और परिस्थितियां किसी जन्नत से कम नही…

Unbroken Official Trailer

स्वयं को साबित करने का आत्मघाती स्पष्टीकरण : The Life Of David Gale…

राजस्थान में एक लोककथा प्रचलित है जिसका सार है कि दो नौजवान राजपूत भाइयों को किसी मुग़ल शासक ने उनकी वीरता साबित करने के लिए कहा गया तो उन्होंने अपने हथियारों से स्वयं को ही मार लिया क्योकि अपने भाई पर अकारण हथियार उठाना वीरता नहीं और न किसी बेक़सूर इंसान और जानवर पर हथियार उठाना… जब अपने आपको साबित करने की जिद उस हद तक बढ़ जाये जहाँ रखे गए विचार की उपयोगिता स्वयं के अस्तित्व से भी बड़ी लगने लगे तो अक्सर आत्मघात ही अंतिम विकल्प के रूप में सामने आता है… दुनिया में पनपा आतंकवाद इसी श्रेणी में रखी जाने वाली निम्नतम और कुरूप कवायद है… अकसर लोग एक समय और परिस्थिती विशेष के आवेग में आकर आत्मघात जैसा कदम उठा लेते हैं सिर्फ ये सिद्ध करने के लिए कि वो सही हैं और बाकी गलत, हालाँकि आत्मघात से मिली सहानुभूति बटोरने के लिए वो कभी भी मौजूद नहीं रह पाते… शायद यही कारण है कि अतीत के ब्रह्मास्त्र और वर्तमान में परमाणु बम अंतिम विकल्प के रूप में आत्मघात का तकनीकी रूपांतरण है… चूँकि बेईज्ज़ती और शर्मिंदगी का पहाड़ दुनिया के किसी भी सांत्वनात्मक हथोड़े से नहीं तोडा जा सकता सिवाए इसके की अपने अस्तित्व को मिटा कर शर्मिंदगी को सहानुभूति से प्रतिस्थापित कर दिया जाये… शायद यही सामाजिक अचेतन में बसा एक कुरूप मनोविज्ञान है जिसे कहानी में पिरो कर The Life Of David Gale में प्रस्तुत किया है…

lavidadedavidgale

David gale, Texas university में दर्शनशास्त्र {philosophy} का हेड ऑफ़ द डिपार्टमेंट और साथ ही Deathwatch {Deathwatch ऐसी संस्था है जो अपराधियों को मृत्यूदंड देने के विरोध में अपना अभियान चलाये हुए हैं} का एक सक्रीय सदस्य था जो Texas में ही अपनी सहकर्मी के रेप और हत्या की सजा काट रहा है और 4 दिन बाद उसे इस अपराध के लिए सजा ए मौत दी जाने वाली है… David gale का Lawyer आधा मिलियन डॉलर के बदले एक मशहूर मैगज़ीन के साथ इस शर्त के साथ David gale की कहानी साझा करने का समझौता करता है कि David का इंटरव्यू उसी मैगज़ीन की एक जर्नलिस्ट Betsey Bloom ही करेगी… Betsey Bloom अपने असिस्टेंट के साथ David gale का इंटरव्यू करने जेल जाती है जहाँ पर उसे तीन दिन तक रोज 1 घंटे David के इंटरव्यू की इज़ाज़त मिलती है… David Gale, Betsey को अपनी The-Life-of-David-Gale_6992_18कहानी {जो कि 3 फ़्लैशबेक्स में चलती है} सुनाता है… इस कहानी में David बताता है कि एक ग्रेजुएशन पार्टी के दौरान उसका बर्लिन नामक लड़की जो कि उसकी स्टूडेंट भी रह चुकी होती है से शारीरिक सम्बन्ध बन जाता है और अगले दिन David को रेप के आरोप में गिरफ्तार कर लिया जाता है. कुछ दिनों बाद बर्लिन द्वारा रेप के आरोप को वापस ले लिया जाता है… लेकिन तब तक David की वैवाहिक, व्यावसायिक और सामाजिक जिंदगी तबाह हो चुकी होती है… इसी बीच नशे में डूब चुके David की जिंदगी का सहारा बनती है उसकी सहकर्मी Constance Harraway जो कि Deathwatch संस्था की एक सक्रीय सदस्य है और एक दिन Constance के इलाज के दौरान पता चलता है कि वो एक असाध्य बीमारी Leukemia से पीड़ित है और कुछ दिनों की ही मेहमान है… tumblr_nijqy0nx9o1t0t91ao3_1280एक रात David और Constance दोनों के बीच शारीरिक संबंध कायम हो जाते हैं और अगले दिन Constance की लाश उसी घर के किचन में मिलती है… पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हत्या का कारण दम घुटना और उसके पहले बलात्कार होना बताया जाता है और लाश के पेट में से एक चाबी भी बरामद होती है जो कि उस हथकड़ी की होती है जिससे उसके हाथ बंधे हुए थे… इस हत्या का आरोपी David Gale को बना दिया जाता है… इधर वर्तमान में इंटरव्यू के तीन दिनों में जर्नलिस्ट Betsey Bloom और उसके असिस्टेंट के साथ कुछ अजीब घटनाएँ घटती है मसलन Cow Boy हेट पहने एक आदमी लगातार उनका पीछा कर रहा है या Betsey Bloom के होटल का ताला खुला मिलता है और वहां उन्हें एक टेप मिलता है जिसमे Constance की मौत के कुछ सेकंडस पहले की विडिओ रिकॉर्डिंग है जिसमे Constance मुंह पर पोलिथीन बंधी होने के कारण घुटन से दम तोड़ देती है… उस विडिओ को बार-बार देखने पर Betsey को कुछ शक होता है और वो खुद के ऊपर वैसा ही एक्सपेरिमेंट करती है जैसी परिस्थिति में Constance की still-of-kate-winslet-and-gabriel-mann-in-the-life-of-david-gale-(2003)-large-pictureमौत हुई थी और खुद भी दम घुटने की वजह से मरते मरते बचती है इसके बाद Betsey निष्कर्ष पर पहुचती है कि जो विडिओ टेप उसे मिला है वो अधुरा है जबकि पूरा टेप अभी भी किसी के पास होना चाहिए और उनका शक उनका ३ दिन से पीछा कर रहे Cow Boy हेट पहने आदमी पर जाता है और वो उसका पीछा करते हुए उसके घर जाते हैं और वहां से Betsey को पूरे विडियो वाला टेप मिल जाता है जिसमे ये खुलासा होता है कि Constance ने खुदखुशी की है न कि David ने उसकी हत्या की है ये चौथा दिन होता है जब David को मृत्युदंड मिलने वाला है और इसमें बस कुछ देर ही और बची है… Betsey वो विडिओ टेप लेकर जेल की और निकलती है लेकिन रस्ते में उसकी कार जवाब दे जाती है लेकिन Betsey दौड़ते हुए जेल पहुचती है लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और David के मौत की पुष्टि कर दी जाती है… जब ये विडिओ मीडिया में आता है तो देश दुनिया में खलबली मच जाती है और मृत्यूदंड को लेकर बड़ी बहस छिड़ जाती है… इधर Betsey को David को नहीं बचा पाने के लिए आत्मग्लानी होने लगती है लेकिन एक दिन उसे अपने ऑफिस में एक कुरिअर मिलता है जिसमे एक टेप होता है तो जब टेप देखती है तो उसकी आँखे फटी की फटी रह जाती है…

5228204,B5jGH8SUJdtW9mW4BIbKPtiqzHTDZzEtgHM7pp77xTJdMf3pUgk7xLDXZ8tKvlDi1H1IAfmPU7pckuW_8sNCwg==क्या David सही में Constance का हत्यारा है या वो निर्दोष है या उसे फंसाया गया है या इसके पीछे कोई और कारण है इसका जवाब यदि फिल्म देख कर पता चले तो ही बेहतर होगा…

Alan Parker द्वारा निर्देशित २००३ में आई ये फिल्म मृत्युदंड के विभिन्न पहलुओं का सामने रखती है साथ ही फांसी की सजा से संबधित उन पूर्वाग्रहों और तथ्यों को उघाडती है जो अपराधी के मृत्युदंड की हामी भरने वाले समाज द्वारा गढ़े गए हैं… फिल्म की कहानी वर्तमान और फ्लैशबैक में झूलती रहती है और बड़ी ही बेहतरी से विस्तार लेते हुए अपने क्लाइमेक्स तक आती है… कहानी की बुनावट सीन दर सीन पैनी होती जाती है कई रहस्य बनते है और खुलते हैं… कुछ सीन बड़े ही रोचक बन पड़ते हैं खास कर टेक्सास का गवर्नर जो कि मृत्युदंड की पैरवी कर रहा है और विरोध कर रहे David gale की टेलीविजन डिबेट वाला सीन जिसमे David गवर्नर को व्यंग और तथ्यात्मक तरीके से मृत्युदंड देने की उसकी जिद को गलत साबित करता है… Betsey और उसके असिस्टेंट का पीछा करता एक व्यक्ति हो या होटल में मिली विडियो टेप ऐसी ही कुछ घटनाएँ फिल्म के थ्रिल फेक्टर को पुश करती है… Betsey का David को बचाने के लिए भागते हुए सबूत ले कर जेल पहुचना और वहां David की मौत का एलान होना फिल्म को अंतिम समय में मर्मस्पर्शी बना देता है…

The-Life-of-David-Gale_6992_17फिल्म का सबसे मजबूत पहलू कहानी की बुनावट और बेकग्राउंड स्कोर है… फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर Alex & Jack Parker ने तैयार किया है जिन्होंने इस फिल्म के अलावा Munich, Milk और The Artist का बैकग्राउंड स्कोर भी तैयार किया है…

फिल्म के तीन मुख्य किरदार Betsey, Constance और David का किरदार क्रमशः Laura Linney, Kate Winslet और Kevin Spacey ने किया है और इसमें सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं Kevin Spacey और Laura Linney… फिल्म की शुरुआत में जब Kevin जेल में होते होते हैं तब उनके चेहरे के भाव थोड़े बहुत इस तरह के लगते हैं जैसे उसने कोई अपराध किया नहीं है और न ही किसी तरह की कोई आत्मग्लानि है ये थोडा अटपटा जरूर लगता है लेकिन फिल्म की अंतिम पड़ाव पर आते-आते सारीLayout_AlanParker2 चीजे स्वत: स्पष्ट हो जाती है… Laura Linney भी कुछ सीन में अपनी छाप छोड़ जाती हैं मुख्यत: वो सीन जब वो आत्मग्लानी से भर जाती है क्योकि एक अपराधी जिसकी मृत्युदंड को रोकने के लिए वो कई महीनो से कोशिश कर रही होती है लेकिन दुर्भाग्य से बचा नहीं पाती… Kate Winslet मुख्य पात्र होने के बाद भी औसत रही हैं…

ये फिल्म देखने वाले को मृत्युदंड के प्रति अन्य पहलुओं पर एक बार सोचने के लिए विवश तो ही कर सकती है… फिल्म में बहुत कुछ ऐसा है जिसमें एन्टरटेनमेंट का पहलू भी है… यदि कुछ नया और अलग तरह का सिनेमा देखने की चाहत हो तो बेशक इस फिल्म को आजमाया जा सकता है…

इत्मीनान की मौत के लिए मददगार हाथो की खोज : TEST OF CHERRY

इत्मीनान संतोष तसल्ली इन शब्दों में दौडती हुई तरंगे ज़िन्दगी में इन्सान के वजूद को कुछ पल का ठहराव देती हैं और यही ठहराव आगामी पड़ावों के लिए दिशासूचक यंत्र की तरह काम करता है… तसल्ली के अभाव में इन्सान का वजूद घूमते हुए लट्टू से ज्यादा नहीं माना जा सकता… अचेतन तसल्ली का धक्का ही है जो इंसान को सचेतन रूप में नित नए रास्तों की और ले जाता है… जीवन के अंतिम क्षण में तसल्ली और संतोष के बोध को मोक्ष के मार्ग से जोड़ कर देखा गया है… अपवाद स्वरुप कभी कभी कुछ घटनाक्रम ऐसे भी घटित होते हैं जहाँ एक इंसान अपनी मौत का आयोजन कुछ विशेष प्रक्रिया से गुज़रते हुए करता है ताकि एक असीम संतोष से अपनी देह त्याग सके और मरणोपरांत उसकी देह सर्वाधिक सुरक्षित रख सके, अतीत में मिस्र के पिरामिंड से ले कर वर्तमान में पश्चिम में चलन है कि बहुत से लोग अपनी जिंदगी में ही अपने पसंदीदा ताबूत और कफ़न का प्रबंध कर लेते हैं… भारतवर्ष में लोग अपने पुश्तेनी गाँव या इच्छित जगह क्रिया-कर्म का दायित्व अगली पीढ़ी को सौंप कर दुनिया से विदा होते है… इसी अपवाद और एक व्यक्ति के मृत्यु के प्रबंधन की यात्रा है फिल्म “TASTE OF CHERRY” जिसमे एक व्यक्ति ऐसे इंसान की तलाश में है जो आत्महत्या के बाद उसकी देह को सुपुर्द ऐ ख़ाक कर दे ताकि जिस देह को लेकर वो जिया है उस देह के प्रति उसकी जिम्मेदारी और मोह को अपना सही मुकाम मिल सके… इस फिल्म में मुख्य पात्र की यात्रा और मददगार शख्स की खोज उसी देहिक मोह का परिणाम है…

78200067_24491b39ba_oBadii नाम का 45-50 वर्षीय व्यक्ति जो इराक की राजधानी तेहरान की सड़कों पर अपनी कार से घुमते हुए एक ऐसे आदमी की तलाश में है जो उसका एक बहुत जरूरी काम कर सके और इस काम के लिए वो बहुत सारा पैसा देने को तैयार है… Badii अपनी इस खोज के लिए तेहरान की सड़कों पर भटकते हुए एक जगह पर से गुज़रता है जहाँ एक पत्थर {floor stone} की दूकान पर काम करने वाला एक लड़का टेलीफोन बूथ से किसी से अपनी आर्थिक परेशानी के सम्बन्ध में बात कर रहा है, Badii उसे अपने साथ काम पर चलने को कहता है लेकिन वो लड़का मना कर देता है और Badii को झिड़क देता है… Badii घुमते हुए एक आदमी के पास आता है जो प्लास्टिक जमा कर रहा है लेकिन वो भी Badii के साथ आने को मना कर देता है… इस तरह तेहरान की सड़कों पर चक्कर लगाते हुए एक कुर्दिश सेनिक जिसकी उम्र लगभग 18 से 20 साल के बीच होती है badii से कुछ दूरी पर स्थित बैरक तक जाने के लिए लिफ्ट मांगता है कुछ देर की सामान्य बातचीत के बाद Badii उस सेनिक को एक छोटा सा काम करने के लिए एक बड़ी कीमत देने की बात कहता है लेकिन काम क्या करना होगा वो नहीं बताता…bscap053s सेनिक उसका ऑफर मान लेता है और Badii उसे लेकर एक शहर से बाहर एक सुनसान जगह पर खाई के किनारे लगे चेरी के पेड़ के पास अपनी कार रोक देता है, पेड़ के नीचे एक गड्ढा खुदा हुआ है… Badii उस सेनिक से कहता है कि वो नींद की गोलियां खाकर इस गड्ढे में सो जाएगा और तुम्हे कल सुबह आकर मुझे आवाज देनी है अगर में उठ जाऊं तो ठीक वरना मेरी लाश के ऊपर मिटटी डाल कर मुझे दफन कर देना… ये सुनकर वो नौजवान सेनिक हडबडा जाता है और मौका पा कर वहां से भाग जाता है… इसके बाद किसी और व्यक्ति की खोज में Badii एक बंद पड़ी सीमेंट फेक्टरी पहुचता है जहाँ पर उसे एक अफगानी seminarist {धार्मिक शिक्षा का विद्यार्थी} मिलता है लेकिन वो Badii को इस काम में मदद के लिए मना कर देता है साथ ही कुरान और हदीस में आत्महत्या के लिए जो बाते कही गई हैं वो Badii को सुनाता है लेकिन अपने फैसले पर अडिग Badii इसके लिए उसे झिड़क देता है…tasteofcherry31 इसके बाद रस्ते में Badii की मुलाकात अधेड़ इंसान से होती है… Badii उसे लिफ्ट देता है और उसे भी वही काम करने का ऑफर देता है जो पिछले दो लोगो दिया था लेकिन इस बार Badii को वो व्यक्ति मिल जाता है जो उसका काम करने को राजी है… चूँकि उस व्यक्ति का बच्चा बीमार है इसलिए वो ये काम करने को राजी हो जाता है… आखिरी सीन में रात के वक़्त badii जाकर उस गड्ढे में लेट जाता है और आसमान में चमकते चंद्रमा को देखता है…

सन 1997 में आई इस ईरानी फिल्म के निर्माता और लेखक, निर्देशक Abbas Kiarostami हैं जिन्होंने बड़ी खूबी से फिल्म को गढ़ा है… फिल्म की कहानी में बेवजह की तार्किक खीचतान से इतर निर्देशक ने मुख्य पात्र “Badii” की ऐसी बुनावट की है कि वो पूरी फिल्म में आत्महत्या के प्रति अपनी मन:स्थिति को अंत तक डिगने नही देता है… निर्देशक ने जिंदगी और मौत में से जिंदगी को तरजीह देने की की बजाय दोनों को संतुलित रखने का प्रयास किया है… अंत में Badii गड्ढे में जाकर लेट जाता है लेकिन वो अगले दिन जिन्दा बचता है या मौत के आगोश में चला जाता है ये विचार निर्देशक ने दर्शकों पर छोड़ दिया है हालाँकि फिल्म के अंतिम दृश्यों में डूबते सूरज और उसकी खुबसूरत लालिमा साथ ही पूर्णिमा के चाँद को इंसानी अस्तित्व के जीवन के प्रति आग्रह को प्रतीकात्मक रूप में रखने की कोशिश की है लेकिन इस दर्शन को दर्शक पर थोपा नहीं…

bscap059dफिल्म में आत्महत्या के प्रति उम्र के चार अलग-अलग पड़ावों से गुज़र रही सोच को बताने की कोशिश की गई है… एक 18 से 20 साल का लड़का आत्महत्या की बात सुनकर भाग खड़ा होता है एक 25-30 साल का नोजवान लड़का Badii को उपदेश देने की कोशिश करता है और 70 की उम्र पार कर चूका एक बुजुर्ग Baddi को जिंदगी के प्रति अपने नज़रिए को बदलने की सकारात्मक और अनुभवपूर्ण बात कहता है… इसके अलावा लगभग 45-50 की उम्र का Badii अपनी आत्महत्या को लेकर दृढ और अलोचपूर्ण सोच लिए हुए है… इन सभी उम्र के पढ़ावों पर इंसानी सोच का सांचा कुछ इसी तरह का होता है…

वैसे तो फिल्म के संवाद साधारण बोलचाल जैसे ही हैं लेकिन फिल्म के अंतिम कुछ दृश्यों में बुजुर्ग द्वारा कही गयी बाते अपने आप में पूरा दर्शनशास्त्र हैं जो जिंदगी के प्रति नजरिये को झकझोर के रख देती हैं…

downloadफिल्म में गिनती के ही कलाकार हैं लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं Badii का किरदार निभाने वाले Homayoun Ershadi और Mr. Bagheri {बुजुर्ग} का किरदार करने वाले Abdolrahman Bagheri दोनों ने अपने अभिनय को जीवंत कर दिया है… Homayoun Ershadi ने लम्बे लम्बे शॉट्स में अपने चेहरे के भाव को निरंतरता दी है और कहीं भी वो एक पल के लिए भी चरित्र से बाहर आ गए हों ऐसा नहीं लगता…

फिल्म धीमी है और फिल्म में काफी लम्बे लम्बे शॉट्स हैं और इस दौरान कई मिनिट्स तक ख़ामोशी छाई रहती है और कोई संवाद नहीं होते हैं… बहुत से सीन इस तरह के भी हैं जिसमे पहाड़ियों के बीच दूर से आती हुई कार बताई जाती है और अन्दर चल रहे संवाद हमें सुनाई देते हैं, badii जो कि आत्महत्या मन:स्थिति लिए समाज और लोगो से दूर जाने की कोशिश में हैं शायद इसी लिए शॉट्स के साथ इस तरह का प्रयोग फिल्म में किया गया… फिल्म में किसी भी तरह का बेकग्राउंड स्कोर नहीं है यदि वजह है फिल्म की कहानी और किरदार सच्चाई को छूते हुए से लगते हैं…

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ईरान की अधिकतर फिल्मों की तरह TEST OF CHERRY भी लाजवाब फिल्म है जिसे एक बार बिना किसी झिझक के देखा जा सकता है {शर्ते लागू}…

स्थाई मौन के पूर्व का क्षणिक कोलाहल : The Bucket List {द बकेट लिस्ट}

जिंदगी गुज़र जाने के बाद आखरी लम्हों में इंसान को एहसास होता है कि असल में अभी तक वो जिंदगी जी नहीं रहा था बल्कि जिंदगी काट रहा था… जिंदगी जीना और काटना दो अलग तरह की चीजे हैं… यदि वक़्त गुज़र रहा है और उस गुज़रते वक़्त में आप भी वक़्त के साथ गुज़र रहे हैं तो ये समझिए कि आप जिंदगी काट भर रहे हैं लेकिन जिस दिन वक्त थम जाये और धड़कने जारी हों तो यही वो पल होगा जो आपने जिया है…

JACK NICHOLSON stars as Edward in Warner Bros. Pictures' comedy drama दुनिया में कुछ ही प्रतिशत लोग ऐसे होते हैं जिन्हें अपनी मौत का समय पता होता है और ये रोज अपनी मौत का तिल तिल करके इंतजार करते हैं या कहें रोज अपनी मौत को जीते हैं, ये वो लोग होते हैं जो किसी गंभीर और असाध्य बीमारी की चपेट में आ जाते हैं… इनमे से अधिकतर लोग आज और मौत के दिन के अंतर को गुमसुम और शिकायती अंदाज में काटते है लेकिन इसके इतर चंद लोग होते हैं जो इन दिनों को उल्लास और ख़ुशी में जीते हैं… इन्ही चंद लोगो में से दो लोगो की कहानी है द बकेट लिस्ट…

Carter chambers एक कार मैकेनिक है जो एक इतिहासकार बनना चाहता था लेकिन जिंदगी की जद्दोजहद ने उसे कार मेकेनिक बना कर छोड़ दिया, दूसरी तरफ Edward Cole चार बार तलाकशुदा और हेल्थ-केयर टायकून अरबपति है… कार्टर और एडवर्ड की पहली मुलाकात अस्पताल के एक वार्ड में होती है जहाँ दोनों अपने कैंसर का इलाज करवाने के लिए एडमिट हुए हैं…TheBucketList_1 चूँकि एडवर्ड उस अस्पताल का मालिक भी है इसलिए वो कार्टर की उसके वार्ड में मोजुदगी उसे नागवार लगती है लेकिन अस्पताल की पालिसी के मुताबिक उसे अपना रूम कार्टर के साथ शेयर करना पड़ता है… धीरे धीरे दोनों में आपसी समझ और दोस्ताना सम्बन्ध विकसित होने लगते हैं… एक शाम कार्टर कागज पर कुछ लिख रहा होता है और एडवर्ड के पूछने पर वो उसे सही जवाब नहीं देता लेकिन अगले दिन वो कागज एडवर्ड को जमीन पर पड़ा हुआ मिलता है तो उसमे कुछ लाइनें लिखी होती, जब एडवर्ड कार्टर से उन लाइन्स का मतलब पूछता है तो कार्टर कहता है कि ये लाइने उसकी जिंदगी की ख्वाहिशे हैं जिन्हें वो मरने से पहले पूरा करना चाहता है, ऐसी ख्वाहिशों को कागज सूचीबद्ध करने को ही “बकेट लिस्ट” कहा जाता है… एडवर्ड कार्टर की लिस्ट में अपनी भी कुछ इच्छाएँ लिखता है जिन्हें वो मरने से पहले पूरा करना चाहता है… इसके बाद एडवर्ड, कार्टर को बकेट लिस्ट की में लिखी ख्वाहिशों को पूरा करने और अपने साथ दुनिया की सैर पर चलने के लिए कहता है लेकिन लेकिन पैसों की कमी से उपजी झिझक की वजह से कार्टर एडवर्ड को मना कर देता है कार्टर की इसी झिझक को एडवर्ड समझ जाता है और उसका सारा खर्च खुद उठाने की बात कहता है और आखिरकार कार्टर को मना लेता है… अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद दोनों दुनिया की सैर और बकेट लिस्ट को पूरा करने के लिए निकल पढ़ते है… bucket-list-pdvd_017अपने टूर की शुरुआत दोनों स्काई डाइविंग, कार रेसिंग से करते हैं, नार्थ-पोल के ऊपर से गुज़रते हैं और फ़्रांस में डिनर करते हैं यहाँ पर बातो बातों में कार्टर को पता चलता है कि एडवर्ड की एक बेटी भी है जो किसी कारणवश अलग रहती है और एडवर्ड से नफरत करती है… कार्टर बकेट लिस्ट में एडवर्ड की बेटी से मिल कर उससे सम्बन्ध सुधारने की बात लिखता है लेकिन एडवर्ड यह बिलकुल नहीं चाहता है… इसके बाद दोनों अफ्रीकन सफारी, मिस्र के पिरामिड, ताजमहल की सैर, चाइना की दीवार पर मोटर-साइकिलिंग करते हुए माउंट एवरेस्ट के बेस पर जाते है लेकिन मोसम ख़राब होने के कारण दोनों को जल्दी वहां से लौटना पडता है… हांगकांग पहुचने पर एडवर्ड एक कॉलगर्ल को कार्टर के लिए हायर करता है लेकिन कार्टर उसके साथ जाने से मना कर देता है और इसी दौरान कार्टर को उसकी पत्नी के प्रति प्रेम का एहसास होता है और वो एडवर्ड से वापस घर लौटने को कहता है और वो वापस अपने देश लौट आते हैं… घर पर जाते समय कार्टर कार को रास्ते में एडवर्ड की बेटी के घर के सामने लाकर रुकवा देता है और एडवर्ड से उसकी बेटी से सुलह करने की बात कहता है लेकिन एडवर्ड कार्टर की इस बात पर बुरी तरह भड़क जाता है और कार्टर को भला बुरा कहते हुए बकेट लिस्ट को फाड़ कर फेंक देता है और गुस्से में चला जाता है… the-bucket-list-paperइधर कार्टर अपने घर लौट कर परिवार के साथ हंसी ख़ुशी डिनर करता है इधर एडवर्ड असमंजस और मायूस है इधर कार्टर रात में ही तबियत बिगड़ जाने से बेहोश हो जाता है… अस्पताल में उसका आपरेशन चलता है और कार्टर दुनिया छोड़ कर चला जाता है… कार्टर के चले जाने के बाद एडवर्ड अपनी बेटी के पास जाता है और उसे माफ़ कर देता है और उसी समय उसकी मुलाकात उसकी नातिन से होती है जिसे गले लगा कर उसे सुकून मिलता है और वो उसका माथा चूमता है और बकेट लिस्ट में लिखी सेकंड लास्ट खवाहिश “दुनिया की बसे खुबसूरत लड़की का चुम्बन” को रेड पेन से काट देता है… आखरी सीन में एडवर्ड का अस्सिस्टेंट हिमालय की छोटी पर जा कर उसकी कब्र पर उसकी पसंदीदा कॉफ़ी का पेकेट रख कर आता है और बकेट लिस्ट में लिखी आखरी ख्वाहिश को काट कर उस लिस्ट को कॉफ़ी के पास रख देता है…

x240-dXLयह फिल्म देखने वाले को भरपूर हंसा सकती है और अंत समय में भावुक भी कर देती है… फिल्म के संवाद और उनसे उपजी कॉमेडी को बहुत बेहतरीन ढंग से लिखा गया है… चूँकि कहानी के दोनों मुख्य  पात्र उम्रदराज हैं इसलिए संवाद और कॉमेडी भी महीन अनुभवों की बुनावट लिए हुए है, फिल्म में कहीं भी ऐसा नहीं लगता है कि संवाद और हास्य का स्तर बोद्धिक नहीं… मिसाल के लिए जब कार्टर से उसकी पत्नी वर्जिनिया मिलने आती है और तमाम सलाह मशवरा करती है तो एडवर्ड व्यंगात्मक शैली में कार्टर को सुनाते हुए कहता है कि “एक रिसर्च के मुताबिक अधिकतर मरीज उनके शुभचिंतकों की वजह से मरते हैं बीमारी से कम”… चूँकि कार्टर एक अच्छा इतिहासकार भी है इसलिए फिल्म में इतिहास से सम्बंधित रोचक किस्से कार्टर के संवादों के माध्यम से सुनने को मिलते है मसलन रेडिओ का आविष्कार मार्कोनी ने नहीं बल्कि निकोला टेस्ला ने किया और कॉफ़ी का शौकीन एडवर्ड जब अपनी पसंदीदा कॉफ़ी का जिक्र कार्टर से करता है तो कार्टर उसे उस ख़ास किस्म की कॉफ़ी की बनने की प्रक्रिया बताता जो बहुत ही अजीब और सुनकर ही उल्टी करवा दे इस तरह की होती है… taj_1यही नहीं फिल्म कैंसर के मरीज और कीमो थेरेपी से उपजे दर्द को भी सामने रखती है, एक सीन में एडवर्ड कीमो थेरेपी के बाद हो रहे दर्द और लगातार उल्टियों से तंग आकर कहता है कि “खुशनसीब होते हैं वो लोग जिन्हें हार्ट अटैक आता है”… फिल्म में कुछ शॉट और सीन ऐसे भी है जो सोचने पर मजबूर कर देते है जैसे, जब कार्टर वर्ल्ड टूर से अपने घर आता है तो पहले वो घर का लॉक खोलने के लिए चाबी निकलता है और फिर न जाने क्यों चाबी वापस रख कर डोर बेल बजा कर अन्दर जाता है, चुकी अब वो कुछ ही दिनों का मेहमान है और ज्यादा दिन इस घर में नहीं बिता पाएगा इसलिए वो घर में एक सदस्य की तरह ताला खोल कर नहीं बल्कि डोर बैल बजा कर अन्दर जाता है…

The bucket list सन 2008 में आई कॉमेडी ड्रामा फिल्म है…24buck फिल्म के निर्देशक Rob Reiner है जो इसके पहले “When harry met sally” और “A few good man” जैसी बेहतरीन फिल्मे बना चुके हैं… फिल्म स्क्रीनप्ले Justin Zackham ने लिखा है… फिल्म में कार्टर का रोल Morgan freeman {मॉर्गन फ्रीमैन} और एडवर्ड का Jack Nicholson {जैक निकल्सन} ने निभाया है… अपने बेहतरीन अभिनय के लिए सबसे ज्यादा 3 ऑस्कर जीतने वाले जैक निकल्सन और 1 ऑस्कर जीतने वाले मॉर्गन फ्रीमैन के अभिनय के बारे में बात करना बेमानी सा लगता है दोनों ने ही फिल्म में अपने किरदारों के साथ पूरी तरह न्याय किया है… फिल्म के अन्य तकनीकी पक्ष सिनेमेटोग्राफी, एडिटिंग आदि औसत से बेहतर हैं… फिल्म अपने आप में जिंदगी का सम्पूर्ण दर्शन है जिसकी थाह फिल्म देख कर ही मापी जा सकती है…

एक कदम दूर मौजूद सफलता के लिए लाखों क़दमों के अनुभवों का रोमांचक सफ़र : The secret life of walter mitty

Mitty

100 में से 99 मौकों पर और 99 व्यक्तियों के साथ होता है कि वो जिस संपत्ति {बौधिक या आध्यात्मिक} को चाहते हैं जिसे ढूँढते हुए जमीन आकाश एक कर देते हैं जिसके लिए हजारो तकलीफें सहन करते हैं वो संपत्ति हमेशा उनके पास पहले से ही मौजूद होती है… हिम्मत, जज्बा, लगन और कठोर परिश्रम सब कुछ होता है उनके पास लेकिन एक शक्ति नहीं होती वो है विज्डम {wisdom, प्रज्ञा} जिससे पहले से हासिल बहुमूल्य संपत्ति की पहचान कि जा सके, ये विज्डम लाखों कदमो और हजारों ठोकरों की जद में एक बाय प्रोडक्ट की तरह पनपता है और यही विज्डम हमें स्वयं के पास मौजूद मूल्यवान संपत्ति को देखने की आँख देता है… इस प्रक्रिया को कस्तूरी हिरण की नाभि में मौजूद कस्तूर की गंध से समझा जा सकता है जिसकी गंध को खोजने के लिए हिरन वादियों में भटकता रहता है, हिरण को कस्तूरी मिल पाती है कि नहीं ये अध्यन का विषय हो सकता है लेकिन पाओलो कोएलो के “द अल्केमिस्ट” से लेकर शिवेंद्र कुमार की “चंचला चोर” {अप्रकाशित} तक मनुष्य ने दर-ब-दर होकर ही प्रज्ञा का दीप प्रज्वलित किया और स्वयं की संपत्ति और अनेकानेक सवालों के जवाबों को खोजा है… Ben stiller द्वारा अभिनीत और निर्देशित फिल्म The secret life of Walter Mitty इसी कड़ी में नया कलेवर है…

the-secret-life-of-walter-mitty-movie-clip-at-work-2013-adam-scott-movie-hdWalter Mitty “लाइफ” नाम की मैगज़ीन {पत्रिका} में नेगेटिव एसेट्स मेनेजर है… Walter अपने ही ऑफिस में काम करने वाली तलाकशुदा और एक ५ साल के बच्चे की माँ Cheryl को मन ही मन पसंद करता है लेकिन अपने मन की बात कहने में हिचकता है… Walter में आत्मविश्वास की कमी है वो अपने साथ हो रहे गलत व्यहवार का विरोध तक नहीं करता बस मन ही मन विद्रोह और आत्मविश्वास की तस्वीरें बनाता रहता है… एक दिन Walter को गिफ्ट के रूप में एक वालेट {पर्स} मिलता है जो कुछ नेगेटिव्स के साथ O’Connell जो कि एक मशहूर फोटोग्राफर है ने उसके काम के प्रति प्रतिबद्ता के लिए दिया है… चूँकि “लाइफ” मैगज़ीन अगले महीने से ऑनलाइन होने जा रही है इसलिए इस महीने इसका लास्ट पेपर एडिशन निकलना है जिसके लिए O’Connell ने कवर पेज के लिए एक फोटो का नेगेटिव भेजा है जिसका नंबर 25 है… 410156-5d0c314e-742c-11e3-b21a-c1acf4d34253जब Walter गिफ्ट के साथ आये नेगेटिव्स को देखता है तो पाता है कि उन नेगेटिव्स में 25 नंबर का नेगेटिव है ही नहीं… इधर मैगज़ीन का एडमिनिस्ट्रेशन Walter से उस 25 नंबर के नेगेटिव की मांग करता है जिससे मैगज़ीन के आखरी एडिशन का कवर पेज तैयार किया जा सके… Walter को उस नेगेटिव के लिए ted जो कि कॉर्पोरेट मेनेजर है से वार्निंग मिल चुकी है… चूँकि O’Connell एक घुमक्कड़ इंसान है इसलिए वो दुनिया में उसका कोई स्थाई ठिकाना नहीं है और न ही वो सेलफोन रखता है इसलिए Walter उससे संपर्क नहीं कर पाता इसलिए Walter खुद O’Connell को खोजने के लिए निकल जाता है ताकि वो उससे नेगेटिव नंबर 25 के बारे में पूछ सके… Walter, O’Connell के भेजे बाकी के फोटोग्राफ्स को गौर से देखता है जिसमें उसे कुछ क्लू मिलते चले जाते हैं और वो ग्रीनलैंड में O’Connell को खोजने के लिए चला जाता है…the-secret-life-of-walter-mitty-longboard-a9plhlux1 अपनी इस यात्रा में Walter एक शराबी हेलीकाप्टर पायलेट के साथ हवाई सफ़र करता है समुद्र में शार्क का सामना करता है और स्केटिंग करते हुए एक ऐसे कसबे में पहुच जाता है जहाँ थोड़ी ही देर में ज्वालामुखी फटने वाला है और बाल-बाल बचता है… इस कसबे में Walter की O’Connell  से मुलाकात होकर भी नहीं हो पाती… थक हार कर और जख्मी हालत में Walter वापस लौट आता है और उसे नोकरी से हाथ धोना पड़ता है इसके बाद वो Cherly से मिलने उसके घर पहुचता है वहां उसे Cherly का तलाकशुदा पति मिलता है और Walter, Cheryl से बिना मिले चला जाता है… O’Connell को न खोज पाने, नौकरी से हाथ धोने और Cheryl  के घर में उसके तलाकशुदा पति की मोजुदगी से चिढ़ा हुआ Walter, O’Connell का दिया हुआ गिफ्ट यानी वालेट को डस्टबीन में फ़ेंक देता है… The-Secret-Life-Of-Walter-Mitty-photos-1हताश Walter, O’Connell के फोटोग्राफ देख रहा होता है तभी उसे फोटोग्राफ में एक क्लू या निशान दिखाई पड़ता है जो कि उसके घर में मौजूद उसके प्यानो पर बना है वो इसके बारे में अपनी माँ से पूछता है तो वो बताती है कि कुछ दिन पहले O’Connell नाम का कोई व्यक्ति तुमसे मिलने घर आया था और O’Connell स्नो लेपर्ड के फोटो लेने जाने वाला था जो कि अफगानिस्तान की सीमा से लगे हिमालय के पहाड़ों में मिलते हैं… ये सुन कर Walter को उम्मीद की किरण दिखाई देती है और वो फिर O’Connell की खोज में हिमालय की और निकल पड़ता है… दुर्गम रास्तों और कठिनाइयों से रुबरु होते हुए वो आख़िरकार O’Connell को हिमालय की एक चोटी पर खोज लेता है… जब Walter, O’Connell से नेगेटिव नंबर 25 के बारे में पूछता है तो O’Connell उसे बताता है कि शायद वो तुम्हारे पीछे की पॉकेट में ही रखा है यानी उस वालेट में जो O’Connell ने Walter को गिफ्ट के रूप में भेजा था और Walter ने जिसे अपनी खीज में डस्टबीन में फ़ेंक दिया था… जिंदगी की ये जद्दोजहद Walter में एक आत्मविश्वास पैदा करती है… Walter अपने घर लौट आता है और उसकी माँ उसे O’Connell का पर्स देती है जिसे वो कूड़ा फेकते समय निकाल लेती है… Walter पर्स से नेगेटिव को निकाल कर ted को दे आता है और देखता तक नहीं है कि आखिर नेगेटिव में ऐसा क्या है जिसके लिए उसने इतनी तकलीफें उठाई है… अगले दिन Walter, Cherly के साथ घूम रहा होता है तभी दोनों एक शॉप पर लाइफ मैगज़ीन के आखरी एडिशन का कवर पेज देखते हैं और देख कर हैरान रह जाते हैं… ये एक खुशनुमा सस्पेंस है जिसे फिल्म के जरिये ही देखा जाये तो ही अच्छा लगेगा…

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The secret life of Walter Mitty फिल्म एक्टर और डायरेक्टर Ben stiller द्वारा अभिनीत और निर्देशित एक रोमांटिक कॉमेडी, एडवेंचर ड्रामा है जो आपको हंसाता है भावुक करता है चौंकाता है और खुबसूरत वादियों में सैर करवाता है… Ben stiller जितने अच्छे निर्देशक हैं उतने ही उम्दा कलाकार भी हैं पूरी फिल्म में Ben stiller ही छाए रहते हैं… Cheryl का किरदार निभा रही अभिनेत्री Kristen wig हो या ted का किरदार कर रहे Adam Scott हो सबका अभिनय अच्छा है लेकिन इनके पास फिल्म में करने को ज्यादा कुछ था नही सिवाय O’Connell के किरदार वाले Sean Penn के जो खुद भी एक बेहतरीन अभिनेता और फिल्म निर्देशक हैं Sean Penn फिल्म के अंत के एक सीन में आकर पूरी फिल्म अपने कंधे पर ले उठा ले जाते हैं…

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फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसकी सिनेमेटोग्राफी है… सिनेमेटोग्राफर Stuart Dayburgh ने फिल्म के हर फ्रेम हर शॉट को बहुत ही ख़ूबसूरती से कैप्चर किया है हर शॉट ऐसा मानो वे वेन गौ जैसे किसी पहुंचे हुए चित्रकार की पेंटिंग हो ख़ास तौर पर वे सीन जब Walter, O’Connell को पहली बार खोजने ग्रीनलैंड जाता है और फिल्म के अंत में जब वो O’Connell को खोजते हुए हिमालय पर पहुँचता है… इन सभी सीन को देख कर अनायास ही ऐसा लगता है कि प्रकृति से बड़ा जादूगर कोई और नहीं है जो आपके मन और आत्मा को तृप्ति दे सके…

फिल्म की सबसे बड़ी खूबसूरती ये भी है कि इसके हर पक्ष को बहुत ही क्रिएटिविटी के साथ बुना गया है भले ही वो क्रेडिट्स ही क्यों न हों ?… फिल्म के प्रायमरी क्रेडिट्स को बहुत खूबसूरती के साथ फिल्म की लोकेशन के साथ मिला कर बुना गया है जो देखने से फिल्म की कहानी और किरदार में बसी मासूमियत को बयां करते हैं…

फिल्म में कुछ चोंकाने और हंसाने वाले घटनाक्रम भी मिलते हैं मसलन लिफ्ट के अन्दर Walter अपने कलीग्स के सामने अपने बॉस ted से बेईज्ज़त होता है और थोड़ी देर के बाद अचानक उसे आत्मविश्वास के साथ जवाब देता है जिससे ted चुप हो जाता है और कलीग्स उससे इम्प्रेस हो जाते हैं, लेकिन अगले पल हमे ये पता चलता है कि असल में Walter एक सपना देख रहा था और वो अभी भी ted से बेईज्ज़त हो रहा है… ठीक इसी तरह के 4-5 सीन अचानक से फिल्म में आते हैं हो बाद में असलियत पता चलने पर दर्शक को गुदगुदाने पर मजबूर कर देते हैं…

The-Secret-Life-of-Walter-Mitty-Image-4फिल्म में अनेक ड्रामा एडवेंचर के साथ एक महीन दर्शन {philosophy} मोजूद है जो फिल्म के आखरी के कुछ सीन में हमसे मुखातिब होता है… जब हजारों मुश्किलों को पार करके Walter, O’Connell को खोज निकालता है तो देखते हैं कि O’Connell हिमालय की बर्फीली पहाड़ीयों के बीच अपना कैमरा ट्राईपोड पर लगा कर स्नो-लेपर्ड का इंतज़ार कर रहा है वो Walter को बताता है कि स्नो लेपर्ड जिसे घोस्ट कैट भी कहते हैं क्योकि ये अपने आपको सबसे ज्यादा छुपा कर रखते हैं और इनकी तस्वीर लेना दुनिया के सबसे मुश्किल काम में से एक है, तभी अचानक उसे लेपर्ड दिखाई देता है और वो Walter को अपने कैमरे से लेपर्ड दिखाता है लेकिन उसका फोटो नहीं लेता Walter के इसका कारण पूछने पर O’Connell जवाब देता है कि मैं इस क्षण को पूरी तरह जी लेना चाहता हूँ और कैमरे का भटकाव मुझे उस क्षण में जीने नहीं देगा…

यदि किसी को ऋषिकेश मुखर्जीनुमा फिल्मे अच्छी लगती होतो The secret life of Walter Mitty को देखना बुरा सौदा नहीं है…

झूठी दुनिया का सबसे बड़ा सच invention of lying…

Invention_of_lying_ver2मनुष्य की बुद्धिमता {intellect} के विकास के हर नए सोपान {various step of development} ने इंसान को कुछ नियामते {gifts} बख्शी है तो कुछ अभिशाप भी दिए हैं… उन्ही अभिशाप में से एक है झूठ, झूठ एक ऐसा विचार या कहें हथियार बन गया है जिसके बगैर आज की दुनिया की कल्पना करना संभव नहीं… अगर दुनिया से झूठ विदा हो जाये तो कला, मनोरंजन और व्यापार की सारी सम्भावना जमीदोज {destroy} हो जाएगी क्योकि ये सभी झूठ के पिलर पर खडे हैं… कला, मनोरंजन और मार्केटिंग {बाजारवाद}, काल्पनिकता के सबसे बडे उपभोक्ता है… काल्पनिकता का असल अर्थ उस सूक्ष्म जगत {microcosm} की वैचारिक लहरों से है जिसका स्थूल जगत {Materialistic world} से सीधा कोई सरोकार नही… काल्पनिकता का मतलब ही जो असल में है नही उसको मान लेने से है, और सबसे बड़ा सच यही है कि कल्पना सच नहीं होती बल्कि प्रायोगिक मायनो {practical way} में झूठ का पुलिंदा होती है, और इसी झूठ के जन्म की व्यंगात्मक अभिव्यक्ति है फिल्म, Invention of laying {झूठ का आविष्कार}…

सन २००९ में आई ये फिल्म एक ऐसी दुनिया की कहानी है जहाँ पर हर झूठ का कोई अस्तित्व ही नहीं है इस दुनिया का हर शख्स सच और केवल सच बोलता है न केवल सच बोलता है बल्कि किसी सच को छुपाता भी नहीं है… इसके अलावा हर शख्स दुसरे की कही हुई किसी भी बात को बिना किसी शक के मान लेता है जैसे कि वो अंतिम सत्य {universal truth} हो…

The-Invention-of-Lyingफिल्म का मुख्य पात्र मार्क बिलिसन जिंदगी से नाखुश ४० वर्षीय बेचलर फिल्म राइटर है और उसकी प्रोफेशनल लाइफ लगभग ख़त्म हो चुकी है और उसे नोकरी से हाथ धोना पडता है…उसके पास घर का रेंट चुकाने के लिए भी पैसा नहीं बचा है और उसके बेंक अकाउंट में ३०० डॉलर ही शेष रहते हैं… जब वो उन आखरी ३०० डालर को निकलवाने के लिए बैंक जाता है तो पता चलता है कि बैंक का सर्वर डाउन है… लेकिन कैशिअर मार्क से उसके अकाउंट के बेलेंस के बारे में पूछती है ताकि वो उसे पेमेंट कर सके तभी मार्क के दिमाग में कुछ सेकंडस के लिए एक केमिकल रिएक्शन होती है और वो केशिअर को अपने अकाउंट का बेलेंस ८०० डॉलर बताता है और पैसा ले लेता है तभी सर्वर की परेशानी हल हो जाती है और कैशिअर को मार्क के अकाउंट का असली बेलेंस यानि ३०० डॉलर का पता चल जाता है लेकिन केशिअर इसके लिए सिस्टम को दोषी मानते हुए मार्क को जाने देती है… ये छोटी सी घटना मार्क को सोचने पर मजबूर कर देती है कि इस दुनिया में ऐसी चीज का भी अस्तित्व हो सकता है जो असल में अस्तित्व में है ही नहीं यानी कि झूठ… इसके बाद झूठ किस तरह से मार्क की जिंदगी को ३६० डिग्री में बदल देता है ये देखना बहुत ही रोचक अनुभव बन पड़ता है…

rj_t479फिल्म के बहुत से सीन आपको गुदगुदाते है और सोचने पर मजबूर भी करते हैं… मसलन, एक सीन में जब टीवी पर कोक का विज्ञापन आता है तो उसमे कोका कोला कंपनी का स्पोक पर्सन कोक की बोतल लेकर कहता है कि “अगर आप कोको कोला पीने का मन बना रहे हैं तो आपका जानना जरूरी है कि कोक और कुछ नहीं ब्राउन शुगर मिला पानी है जिसमे बहुत सारी शकर और हाई केलोरी सोडा मिली हुई है जो आपको आपके बच्चो को मोटापा और बहुत सी बिमारियों से ग्रसित कर देगी”

सड़क पर बैठा भिखारी जिसके हाथ में एक बोर्ड है जिस पर लिखा है कि “I am not understand why I am homeless and you r not ”

मार्क और एना की डेट के समय वेटर का ऐना से कहना कि उसने जूस लाते समय
उसमे से एक सिप पिया है और वेटर का मार्क के सामने ऐना से उसका कांटेक्ट नंबर मांगना और ऐना के मना करने पर ऐसे रियेक्ट करना जैसे कुछ हुआ ही न हो…

2331_4इसी तरह फिल्म में बहुत से ऐसे सीन और Mise-en-scenes हैं जिन्हें देख कर हंसी नहीं रोक पाएँगे और आपको पता चल सकेगा कि हमारी जिंदगी में झूठ असल में आया कहाँ से..? और सबसे चौंकाने वाली बात कि जिस फिल्म का नाम invention of lying है उसमे lie {झूठ} नाम का कोई शब्द ही नहीं है…

फिल्म के रायटर, डायरेक्टर Ricky Gervais & Matthew Robinson हैं… मार्क का किरदार Ricky Gervais ने ही प्ले किया है जबकि ऐना का Jennifar Garner ने…

तकरीबन १९ मिलियन डॉलर में बनी इस फिल्म ने वर्ल्ड वाइड ३२ मिलियन से अधिक का कारोबार किया था… एक ही पैटर्न की घिसी पिटी कॉमेडी को देख कर कोफ़्त होने लगी है तो यह फिल्म नए तरह की हलकी फुलकी कॉमेडी से आपको हंसा सकती है… १०० मिनिट की इस फिल्म को देखना एक अच्छा अनुभव है…